Monday, November 11, 2019

Livestock Production and Management


Livestock Production and Management

Identification Of The Animal :- 

किसी पशु के जन्म के शीघ्र बाद ही उसकी पहचान कायम करना जरुरी होता है. पहचान चिन्ह अंकित करने के निम्न उद्देश्य है :-

Objective Of Identification Of Animal :-

 1.      पशुओ के बड़े – बड़े झुंडो में प्रत्येक पशु की व्यक्तिगत पहचान के लिए उन्हें किसी संख्या में अंकित किया जाता है. 
2.      पंजीकरण करने के लिए. 
3.      वंशावली की जानकारी के लिए. 
4.      निरीक्षण करने के लिए  एवं उत्पादन रिकॉर्ड करने के लिए. 
5.      पशु मेले की प्रदर्शनी आदि में बहुत सारे पशु एक साथ मिल जाते है. अलग पहचान के लिए पशु पर नंबर होना आवश्यक होता है. 
6.      चोरी या घूम जाने पर पहिचान बनाने के लिए.

Method Of Identification :-

1)      Tagging Method
2)      Branding Method       a) Cold Branding       b)Hot Branding
5)      Ear Notching
6)      Tattooing

Tagging Method :-

इस विधि द्वारा चिन्हित करने के लिए धातु (एल्युमिनियम) की पट्टी या छल्ले का उपयोग किया जाता है. इस पट्टी या छल्ले के ऊपर पशु का चिन्ह अथवा नंबर डालकर एक मुजबुत धागे या रस्सी की सहायता से पशु के किसी भाग जैसे :- गर्दन, पूछ, तथा कान में बांध देते है. इस प्रकार के चिन्ह का प्रयोग छोटे पशु जैसे :- मुर्गी, भेड़ तथा बकरियों में किया जाता है. यह विधि सरल व सस्ती है. परंतु पशु का चिंह निकट आकर ही पहचान आता है. या पढ़ा जा सकता है. इसे किसी भी आयु के पशुओ को बंधा जा सकता है.

Branding Method :-

पशु को दागना ही Branding कहलाता है.

a) Cold Branding :-

इस विधि में पशुओ को चिन्हित करने के लिए रासायनिक पदार्थो जैसे :- हंडम तेल, ब्रंडील्क्स आदि का प्रयोग किया जाता है. जो अंक या नंबर दागना होता है. उसे रासायनिक घोल में भिगोकर द्रंडीम ढ़ाचे द्वारा पशु की जांघ पर लगा दिया जाता है. इस अंक के निचे पशु के बाल उतर जाते है.

b) Hot Branding :-

इस विधि द्वारा पशुओ पर बनाए गए चिन्ह बहुत समय तक बने रहते  है. यह चिन्ह पशुओ की जांघ पर बनाया जाता है. इस विधि से अंक डालने के लिए नंबर डालने वाले मुट्ठे में आवश्यक अंक लगाकर उसको आग में लाल सुर्ख हो जाने तक तपाते है. फिर इनको दाग लिया जाता है. दागने के तुरंत पश्चात जिंक ऑक्साइड मलहम लगा देते है.

Ear Notching :-

इस विधि में पशुओ को चिन्हित करने के लिए उनके कानों में छेद बनाकर या कानों के किनारे काटकर चिन्ह बनाये जाते है. यह विधि उन पशुओ के लिए ठीक है. जिनके कानों आन्तरिक पर काले अथवा बालदार होते है. भेंस अथवा सूअर को चिन्हित करने के लिए इस विधि का प्रयोग किया जाता है.

Tattooing :-

इस विधि में कन के भीतरी भाग को पहले स्प्रिट द्वारा साफ कर लेना चाहिए इसके पश्चात कान गोदने की मशीन द्वारा पुरे कन की आन्तरिक सतह पर मशीन को दबाकर चिन्हित कर सकते है. संयंत्र में संख्याए कणों के रूप में उभरी होती है. यह कटे कान की आन्तरिक सतह पर गुद जाता है. उसके उपर गोदने की स्याही लगा देते है.

क्रत्रिम गर्वाधान :-

स्थानीय पशु नस्ल सुधार हेतु समिति में क्रत्रिम गर्वाधन सुविधा सदैव उपलब्ध रहती है। समिति के प्रसिक्षित कर्मचारियो द्वारा यह कार्य किया जाता है। गायों के लिए जर्सी और होलेस्टन-फ्रीजन गाय के संडो का तथा भैंसो के लिए मुर्र वीर्य उपलब्ध कराया जाता है। ताकि नस्ल सुधार के साथ-साथ दूध का उत्पादन भी बढ़ सके।

संतुलित पशु आहार :-

संघ के अपने संयंत्र मे बना संतुलित आहार समिति के हर सदस्य को लागत मूल्य पीआर दिया जाता है। यह आहार विषेषज्ञो की देखरेख मे निर्धारित मानक के आधार पर तैयार किया जाता है। सुदाना के सम्बंध मे जानकारी प्रथक से विस्तार मे दी जाएगी।

प्रशिक्षण कार्यक्रम :-

समिति के सभी कर्मचारी को उनके कार्य का व्यवहारिक प्रसिक्षण दिया जाता है। क्योकि उनके लिए अपने कार्य मे दक्ष होना जरूरी है। इसी प्रकार समिति की प्रबंधकरिणी समिति के सदस्यो को समिति कार्यो के सकल संचालन हेतु संघ द्वारा ही प्रसिक्षण दिया जाता है। वर्तमान मे मध्य प्रदेश डेरी को आपरेटिव केडरेसन द्वारा पशु स्वस्थ रक्षक कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है।

Different Livestock Development Programs Of Gov. Of INDIA :-

मध्य प्रदेश मे दुग्ध विकास योजना सन 1975 मे विश्व बैंक के सहयोग से रुपये 24.97 करोड़ की लागत से प्रथम चरण मे प्रारम्भ मे की गई योजना की मूलरूप देने हेतु राज्य स्तर पर मध्यप्रदेश दुग्ध विकास निगम की स्थापना की गयी।
               राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के मार्गदर्शन एवं तकनीकी सहयोग से सहकारिता पर आधारित सर्वोत्त्म अमूल पद्धति को आधार बनाया गया। परियोजना के अंतर्गत 1200 ग्रामीण दुग्ध उत्पादक समितीयो का गठन, राज्य के दुग्ध प्रक्षेत्रों भोपाल, इंदौर एवं उज्जैन मे करने का लक्ष्य रखा गया।
               आधुनिक दुग्ध संयंत्र एवं समर्द्ध दुग्ध क्षीत केंद्र तथा दो संतुलित पशु आहार संयंत्रों के निर्माण ओर दुग्ध उत्पादन वर्ध्दी हेतु निवेषो को सदस्य दुग्ध उत्पादको को उनकी सुविधा अनुसार उपलब्ध कराना जैसे – संतुलित पशुचिकित्सक सेवाएँ, आधुनिक क्रत्रिम गर्वाधान सेवाएँ, संतुलित पशु आहार खद्दान, हरा चारा विकास सेवाएँ और प्रभावसली विस्तार सेवाओ के माध्यम से आधुनिक पशुपालन पद्धतियों का प्रचार-प्रसार आदि की व्यवस्था की गयी।

                                                                -:जाफराबादी:-


पाये जाने वाले स्थान :-

इस नस्ल का मूल स्थान कठियावाड मेहसाना तार गीर वनो मे है।

वर्णन :-

इनका रंग प्रायः काला, माथा उभरा हुआ, आंखे गहरी होती है। शरीर लम्बा, बहुत बड़ा ओर ढीला होता है। भैसो की गर्दन छोटी तथा भारी होती है। पिठे थोड़ी मजबूत होती है। अगले पैरो पर बड़े-बड़े बालो के गुच्छे होते है। सिंग भारी लम्बा तथा गर्दन के दोनों तरफ झुक कर अंत मे कुंडली सी बनाते है। भैसो का थन सुविकसित होता है।

उत्पादन :-

इस नस्ल की भैंस एक ब्यात मे 1800 kg दूध देती है। नर पशु हल्के कामो के लिए उपयोगी होते है। नर पशु का वजन 600 kg ओर मादा पशु का वजन 450 kg होता है।

                                                        -:नीली-रावी:-


पाये जाने का स्थान :-

इस नस्ल की भैंसे सतलज और रावी नदियो के आस-पास के क्षेत्रो मे पायी जाती है। यह पंजाब के फिरोजपुर जिले के आसपास भी पायी जाती है।

वर्णन :-

यह नस्ल मुर्र नस्ल से कुछ मिलती-जुलती है। भैंसों का आकार मध्यम होता है। इसकी गर्दन लम्बी पतली और सिर छोटा होता है। रंग काला तथा चेहरा भूरा माथे तथा टाँगो पर सफ़ेद बाल होते है। सींग छोटे तथा मुड़े हुए होते है। पुट्ठे मजबूत होते है। थन भारी तथा पूर्ण विकसित होते है।

उत्पादन :-

इस नस्ल की भैंस एक ब्यात मे औसतन 1600 kg दूध देती है। नर पशु खेती के कामो के लिए उपयुक्त होते है। नर पशु का वजन औसतन 600 kg और मादा पशु का वजन 450 kg होता है।

                                                           -:भदावरी:-

पाये जाने का स्थान :-

इस जाती का मूल स्थान भदावरी, इटावा जो आगरा जिले मे है। तथा ग्वालियर जिले का पर्वतीय क्षेत्र है। इटावा इस जाती का उदगम क्षेत्र नही है। परंतु यह जाती इस पूरे जिले मे पायी जाती है।

वर्णन :-

इस जाती के पशुओ का रंग बादामी या तांबे के रंग जैसा होता है। सिर हल्का और छोटा होता है। सिंग ऊपर की ओर मुड़े होते है। माथा चौड़ा तथा नीचे से दबा हुआ होता है। थन तथा स्तनाग्र मध्यम आकार के होते है।  शरीर पर बादामी रंग के बाल होते है। जो जड़ के पास काले होते है। कुछ पशुओ के बाल पूर्णतः बादामी होते है।

उत्पादन :-

इस नस्ल की भैंस लगभग एक ब्यात मे 1000-2000 kg दूध देती है। सांड क्रषी कार्य के लिए उपयोगी होते है। इस भैंस मे मक्खन ज्यादा होता है। वसा 13% होती है।

                                                               -:सुरती:-

पाये जाने का स्थान :-

इस जाती का मूल स्थान गुजरात राज्य का खेड़ा और बड़ौदा जिला है। इसके अतिरिक्त यह जाती इस राज्य के अन्य जिलो तथा महाराष्ट्र राज्य मे पायी जाती है।

वर्णन :-

इस नस्ल के पशुओ का रंग तांबे जैसा भूरा होता है। सिंग लम्बे तथा दरन्ती की तरह मुड़े होते है। सिर गोल मुह लम्बा तथा मुतान छोटी होती है। गर्दन मोटी तथा टांगे छोटी होती है। गले के निचले हिस्से पर एक सफेद लाइन होती है।

उत्पादन :-

इस नस्ल की भैंस एक ब्यात मे औसतन 1000-1800 kg दूध देती है। पशु कम आहार पर भी अपना गुजारा कर लेते है। दूध मे मक्खन ज्यादा होता है।

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